शायद #poetry

वैसे, जो यहां है वो मैं नहीं हूं, मैं तो शायद,
उन किताबों के आखिरी पन्नों पे हूं जो मैंने कल पढ़ा था ।
या, फिर उन लम्हों में जो मुझे बेहद सुकून सा लगा था ।
किसी पुराने किस्सों और कहानियों में शायद,
या घर की रसोई में,
मां के हाथ के स्वाद में,
या, फिर, दादी की उन मीठी लोरियों में,

गोधूली के उस हल्के अंधेरे में भी शायद, मैं ही तो हूं।
अपने मन के उजालों पे इन काले स्याह आवरण का अधिपत्य,
मैं बस देखता रह जाता हूं ।

कभी कभी मैं न उन भोर के उजालों में भी हूं।
तब तब, जब मेरी कोशिशें सफल होती हैं,

मन के इस अंधकार को वापस उजालों में तब्दील करने की,

और तब तब मैं होता हूं, भोर।

ये स्वच्छंद आकाश,
ये अतल समुंद्र,
ये गलियां, ये कुचें,

शायद इन सब में थोड़ा- थोड़ा मैं हूं।

मैं हूं, शायद इस दुनिया की हर उन छोटी चीजों में,
जो लोगों की नजरों में नहीं आती कभी मगर,
इन हर चीज़ों में थोड़ा-थोड़ा खुद को पाने के बाद भी,
लगता है,
जो यहां है, वो मैं नहीं हूं

Also Read

Shayad

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

%d bloggers like this: