KK (Krishnakumar Kunnath) 1968-2022

कृष्ण कुमार कुन्नाथ ( के.के.) भारतीय सिनेमा का वह गायक, जिसको सब उसकी मखमली और क्रिस्टल क्लियर आवाज़ से ही जानते थे और जानते रहेंगे। एक ऐसा गायक जिसे, जितनी पहचान मिलनी चाहिए, उतनी शायद मिली नहीं। ऐसा गायक जिसने बताया कि कलाकार बनने के लिए दिल टूटना सिर्फ़ एक मिथक भर है। जिसने अपनी आवाज़ में दुनिया से पूछा कि ‘इश्क़ करना क्या कोई गुनाह है, जिस कारण एक इंसान लुट जाता है!

जिसके गाने सुनकर आप भले ही प्यार में न हों, फिर भी खुद से पूछ बैठते हैं – ‘क्या मुझे प्यार है!’। आपका इश्क अधूरा रहा हो या ना रहा हो लेकिन ‘बीते लम्हे’ आपको याद आ जाते हैं। आपकी कोई प्रेमिका हो या न हो, आप कल्पना करके मन-ही-मन ‘तू ही मेरी शब है सुबह है, तू ही दिन है मेरा’ गुनगुना उठते हैं। जिसे सुनकर आपके ‘ख्वाबों, यादों और इरादों’ में सिर्फ़ वह-ही-वह रहती है। आप चाहने लगते हैं कि ‘कोई दस बहाने करके आपका भी दिल ले जाए।’ अगर आप किसी को एकतरफा पसन्द करते हैं तो आप ख़ुद से पूछ बैठते हैं कि ‘कैसे समझाऊं तुझे,मेरा पहला-पहला प्यार है !

आप ‘उसके दिल में ज़रा सी जगह पाने के लिए’ परेशान हो उठते हैं। उसका ‘चेहरा आपको एक रूबाई’ सरीखा लगने लगता है। उसकी ‘आँखों में आपको अजब सी, अजब सी अदाएं’ दिखने लगती हैं। आपका ‘दिल उसके लिए इबादत’ करने लगता है और आप पर ‘उसे हासिल करने की धुन सवार’ हो जाती है। एक ऐसी आवाज़ जिसे सुनकर, वफ़ा वाले दौर में आप ‘तेरी अदाओं से, दिलकश खताओं से.. इन लम्हों में ज़िन्दगी सी है!’ टाइप महसूस करते हैं और बेवफाई वाले दौर में ‘सच कह रहा है दीवाना, दिल.. दिल ना किसी से लगाना, झूठे हैं यार के वादे सारे, झूठी हैं प्यार की कसमें..’ गा-गुनगुनाकर दोस्त-यार को सतर्क करते हैं।

एक ऐसी आवाज़ जो बच्चे-बूढ़े-नौजवान सभी के दिलों में ‘आशाएं’ भर देती है कि ‘अब मुश्किल कुछ भी नहीं।’ जो सभी में ‘तूफानों को चीर के, मंज़िलों को छीन ले’ वाला संकल्प एवं जोश (भले ही कुछ देर के लिए ही सही) भर देती है। ऐसी आवाज़, जिसने कॉलेज के दिनों में सभी पीढ़ी के स्टूडेंट्स में ‘यारों जी भर के जी ले पल, लगता है आज कल, दौर अपना आएगा.. यारों जो खुद पे हो यकीन तो ज़िन्दगी हसीं.. तुझे कल बुलाएगा..’ वाला जुनून पैदा किया और आज भी यही भाव पैदा करता है। कॉलेज में फेयरवेल हो या रिल्स की दुनिया, सभी जगह चुपके से बैकग्राउंड में के.के. की आवाज़ सुनने को मिल जाती है कि ‘हम रहें या ना रहें कल.. कल याद आयेंगे ये पल!’ लेकिन इतनी जल्दी यह आवाज़ हमेशा के लिए खामोश हो जायेगी, सोचा न था।

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मेरे सबसे पसंदीदा कलाकार इरफ़ान और के. के. थे। दोनों लगभग 53-54 साल की उम्र में दुनिया छोड़ गए। ऐसा महसूस हुआ, जैसे कोई फिल्म इंटरवल के समय ही खत्म माननी पड़ रही हो। मन में यही ख्याल आया कि काश ! कोई आकर कह देता कि ‘पिक्चर अभी बाकी है दोस्त!’… काश! जिंदगी भी वेब सीरीज की तरह होती, जिसके अगले सीजन का हमें इंतज़ार रहता लेकिन अफसोस…।

लोग कहते हैं कि कलाकर कभी मरते नहीं, उनकी कला, उनको हमारे बीच हमेशा जिंदा बनाए रखती है। सच बात है। लेकिन यह भी सच है कि उनके जाने के बाद कला की दुनिया के कैनवास पर बहुत सी ऐसी खाली जगह रह जाती है, जो शायद और रंग-बिरंगी होने का हक़ रखती थी। अभी बहुत से ऐसे गाने हो सकते थे, जो निरंतर रंगहीन होती दुनिया में कुछ पल के लिए ही सही, लेकिन कुछ नए रंग में भरते।

ऐसे गाने और ऐसी आवाज़ जिसने हमारी पीढ़ी को प्यार को त्योहार की तरह सेलिब्रेट करना सिखाया। जिसे सुनकर हमने इश्क की दुनिया में कैटरपिलर से बटरफ्लाई तक का सफर तय किया। अफ़सोस कि अब वह आवाज़ फिर सुनाई नहीं देगी। अफ़सोस कि के. के. फिर नहीं गाएंगे… अफ़सोस कि पूरी दुनिया के दिलों को अपनी आवाज़ से जिंदा रखने वाला के.के. इनिशियल्स वाला एक और नामचीन गायक जीवन के बीच धार में दिल के दौरे से अपनी ज़िंदगी हार बैठा।

अपने फेवरेट सिंगर से एक ही बात कहने को बाकी रह गई, जो उन्ही का एक गाना है ‘अलविदा! अलविदा! कोई पूछे तो ज़रा क्या सोचा और कहा अलविदा… अलविदा अलविदा अब कहना और क्या जब तूने कह दिया अलविदा…’ Kk

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